सभ्यता
विमर्श और ग्राम स्वराज्य में गांधी दर्शन का मनोविज्ञान
गांधी जी के जीवन को एक छोटी सी घटना, जो दक्षिण
अफ्रिका में 7
जून 1893 को डरवन से प्रिटोरिया के बीच पीटरमारिटजबर्ग
पहुँचने से पहले थर्ड क्लास वाले डिब्बे में जाने के लिए कहा गया। लेकिन गांधी इससे इनकार चले गये और अपना
परिचय देते हुए कहते हैं, मैं बैरिस्टर हूँ, मेरे पास इस डिब्बे में सफर करने का
टिकट भी है। फिर भी वहाँ के टी.
टी. उन्हें काला आदमी कहके पीटरमारिटजबर्ग स्टेशन में जबरदस्ती उतार दिये। ये घटना गांधी के दिल-दिमाग पर असर डाला। इसके अलावे इन्हें कई बार भेद-भाव का सामना भी
करना पड़ा था। एक बार घोड़ागाड़ी में
अंग्रेज यात्री के लिए सिट नहीं छोड़ने पर पायदान पर बाकी यात्रा की और चालक की मार
भी झेलनी पड़ी थी। यहाँ से सभ्यताओं की
विभिद्ता और आधुनिकता के परिणाम को देख तथा समझ पाये। जिसका जिक्र वो हिन्द स्वराज्य नामक पुस्तक
में विस्तार से करते है।
गांधी जी द्वारा स्वरचित ‘हिन्द स्वराज्य’
नामक पुस्तक जो सभ्यता विमर्श की दिशा की ओर
ले जाती है।‘हिंद स्वराज’ के बारे में गांधी कहते हैं- मेरी इस छोटी सी किताब की ओर विशाल जनसंख्या का
ध्यान खिंच रहा है, यह
सचमुच ही मेरा सौभाग्य है। यह मूल तो गुजराती में लिखी गई है। इसका जीवन-क्रम अजीब
है। यह पहले-पहल दक्षिण अफ्रीका में छपनेवाले साप्ताहिक ‘इंडियन
ओपीनियन’ में प्रकट हुई थी। 1909 में
लंदन से दक्षिण अफ्रीका लौटते हुए जहाज पर हिंदुस्तानियों के हिंसावादी पंथ को और
उसी विचारधारावाले दक्षिण अफ्रीका के एक वर्ग को दिए गए जवाब के रूप में यह लिखी
गई थी। लंदन में रहनेवाले हर एक नामी अराजकतावादी हिंदुस्तानी के संपर्क में मैं
आया था। उसकी शूरवीरताका असर मेरे मन पर पड़ा था, लेकिन मुझे
लगा की उनके जोश ने उलटी राह पकड़ ली है। मुझे लगा कि हिंसा हिंदुस्तान के दुःखों
का इलाज नहीं है और उसकी संस्कृति को देखते हुए उसे आत्म रक्षा के लिए कोई अलग और
ऊँचे प्रकार का शस्त्र काम में लाना चाहिए। दक्षिण अफ्रीका का सत्याग्रह उस वक्त
मुश्किल से दो साल का बच्चा था। लेकिन उसका विकास इतना हो चुका था कि उसके बारे
में कुछ हद तक आत्मविश्वास से लिखने की मैंने हिम्मत की थी। मेरी यह लेखमाला
पाठक-वर्ग को इतनी पसंद आई कि वह किताब के रूप में प्रकाशित की गई। हिंदुस्तान में
उसकी ओर लोगों का कुछ ध्यान गया। बंबई सरकार ने उसके प्रचार की मनाही कर दी। उसका
जवाब मैंने किताब का अंग्रेजी अनुवाद प्रकाशित करके दिया। मुझे लगा कि अपने
अंग्रेज मित्रों को इस किताब के विचारों से वाकिफ करना उनके प्रति मेरा फर्ज है।
मेरी राय में यह किताब ऐसी है कि यह बालक के हाथ में भी दी जा सकती
है। यह द्वेष-धर्म की जगह प्रेम-धर्म सिखाती है, हिंसा
की जगह आत्म-बलिदान को रखती है, पशुबल से टक्कर लेने के लिए
आत्मबल को खड़ा करती है। इसकी अनेक आवृत्तियाँ हो चुकी है और जिन्हें इसे पढ़ने की
परवाह है, उनसे इसे पढ़ने की मैं जरूर सिफारिश करूँगा। इसमें
से मैंने सिर्फ एक ही शब्द–और वह एक महिला मित्र की इच्छा को
मानकर–रद्द किया है; इसके सिवा और कोई
फेरबदल मैंने इसमें नहीं किया है। इस किताब में ‘आधुनिक सभ्यता’ की सख्त टीका की गई है। यह 1909
में लिखी गई थी। इसमें मेरी जो मान्यता प्रगट की गई है, वह आज पहले से ज्यादा मजबूत बनी है। मुझे लगा है कि अगर हिंदुस्तान ‘आधुनिक सभ्यता’ का त्याग करेगा, तो उससे उसे लाभ ही होगा। आधुनिक सभ्यता जिस विकास को दुनिया के सामने लाया है। इसके प्रभाव को हम इस प्रकार समझ सकते हैं- जिस तरह चूहे फूक-फूक कर मनुष्य के
शारीर को कुतरते हैं और हमें पता नहीं चल पाता है। चूँकि चूहे के फुकने के बाद
शरीर का वह अंग भोथरा हो जाता है. उसी प्रकार से आधुनिक विकास का असर नई आर्थिक
नीति लागु होने के बाद प्राकृतिक संसाधन और उत्पादन के साधनों पर मालकियत के
सम्बन्ध में कोर्पोरेट हितैषी नीति अपनाने से संसाधनों की लूट के रूप में देखा जा
सकता है और इसका सबसे अधिक प्रभाव जमीन पर पद रहा है. आज पुरे देश में जमीं की
बेतहाशा लुट मची हुई है. देश के किसानों से तेजी से जमीन छिनी जा रही है. उसकी
मालकियत बदली जा रही है. राष्ट्र निर्माण एवं विकास के नाम पर औद्योगिक गलियारे,
आद्योगिक क्षेत्र, सेझ, बड़े बांध, कोयला खदान, बिजली परियोजना, स्मार्ट शहर, शहर
विस्तार, राजमार्ग, बंदरगाह, हवाई अड्डे, रिअल स्टेट और कोपोरेट फार्मिंग आदि के
लिए बड़े पैमानें पर किसानों से जमीन छिनी जा रही है. 1990 के उदारीकरण के बाद से
दुनिया में खुले बाजार की नीति का अगमन हुआ इस दौरान छोटे छोटे लघु कुटीर उद्योग
एवं खेती से सम्बन्धित प्रारंभीक बीज एवं खेती के तरीके नकारा जाना शुरू हो गया.
उदारीकरण ने पूंजी का इस कदर बाढ़ लाया. जिस पर आधारित होकर कई तरह के बड़े बड़े
उद्योगों का परियोजना का निर्माण होने लगा. धीरे धीरे पूंजी का कार्पोरेटकरण हुआ
और मल्टीनॅशनल कंपनी का भारत में आगमन हुआ. इसके प्रभाव के रूप में पर्यावरण
प्रदुषण, जल प्रदुषण, वायु प्रदुषण, साइक्लोन, अम्लीय बर्षा, ओजोन परत में छिद्र
का बढ़ना, बेरोजगारी, विषमता, आतंकवाद और नक्सलवाद के रूप में देखने को मिलता है.
ये हमें रोज चूहे की तरह कुतर-कुतर कर खाए जा रही है, परन्तु हम आज भी प्रकृति के
साथ सहजीवन जीने को तैयार नहीं है.
गांधी जी की दूसरी रचना, रचनात्मक कार्यक्रम है, जो नयी सभ्यता और
संस्कृति के निर्माण का प्राकथन है। इनकी तीसरी और महत्वपूर्ण रचना आश्रम व्यवस्था
है, जो जीवन दर्शन और आत्म मूल्यांकन का केंद्र है। इन तीन रचना पर जो भी व्यक्ति
अध्ययन-मनन के पश्चात प्रयोग में जायेंगे। सच्चे अर्थों में उन्हें स्वराज्य का
अहसास होगा।
गांधी
जी द्वारा प्रदत आश्रम व्यवस्था का प्रथम प्रयोग फिनिक्स आश्रम है। जो पश्चिमी
सभ्यताओं से पनपी हुई कुरुरता तथा कृत्रिम विकास का विकल्प है। यह एक ऐसा दर्शन
है, जो वास्तविक जीवनशैली और यथार्थ से परिचय कराता है। इनके दर्शन में व्यक्ति,
समाज, धर्म और सता को पुर्नमूल्यांकन का इजाजत है। इनके द्वारा फिनिक्स आश्रम से
लेकर सेवाग्राम आश्रम तक का स्थापना करना एक मात्र सनक नहीं हो सकता।
बल्कि यह सत्य को समझने का सम्पूर्ण दर्शन है। आखिर गांधी जी ने पश्चिमी सभ्यता को
शैतानी सभ्यता क्यों कहा?–क्योंकि पश्चिम ने मनुष्य को मनुष्यता से दूर कर एक मशीन
बना दिया है। गांधी उस मशीनरूपी असंवेदनशील मानव में संवेदना का प्रखर प्रवाह
डालने हेतु आश्रम व्यवस्था को ‘मानव निर्माण प्रशिक्षण केंद्र’ के रूप में विकसित
करते है। जहाँ कोई किसी का कोई गुरु नहीं होता है, गांधी मनुष्य को एक स्वचलित
यंत्र मानते हैं, जिसमे चेतना, ज्ञान-विज्ञान समाहित है। इसलिए मनुष्य में स्वयं
के निर्माण की क्षमता है। चूँकि मनुष्य प्रकृति का एक इकाई है। प्रकृति
गतिशील है, इसलिए मनुष्य भी हमेशा गतिशील रहेगा। यही गतिशीलता विकास की धुरी है। गांधी
का विकास रूपी सत्य प्रकृति प्रदता पर टीका है। इसके अलावा कृत्रिम विकास है।
सभ्यताओं ने अपनी विकास में नगरों का, महानगरों का, स्वार्थ का, लोभ-लालच और
कृत्रिम जीवन शैली को विकसित किया है। तथा मानव को प्रकृति से दूर कर उसके जीवन को
रसहीन बना दिया है।
सन 1936
में जब गांधी जी सेवाग्राम आये तो उनके सामने देश को आजादी दिलाना
एक मात्र चुनौती नहीं था। बल्कि साम्राज्यवाद के विकसित स्वरूप को ध्वस्त करना भी
था। जिसे पश्चिम की सभ्यता ने रच-गढ़ रखा था। आज भी अप्रोरोक्ष्य रूप से पश्चिमी
सभ्यता अपनी संस्कृति को थोपकर हमारे आर्थिक नीतियों पर, सामाजिक ढांचाओं पर और
हमारी एकता-अखंडता पर लगातार हमला बोल रही है। ऐसे में सेवाग्राम आश्रम और गांधी
जी के प्रयोगों को मूर्त रूप देने की आवश्यकता है। ताकि आधुनिक विकासवाद की निति
के जगह गांधी जी के दर्शन से प्रकृति प्रदत चीजों को आगे लाकर मानव सभ्यता को
बचाया जा सके। उनका पूरा जीवन एक प्रयोग था। वे कहते हैं ‘मेरा जीवन ही मेरा सन्देश
है’। सम्पूर्णता में इनके प्रयोगों को देखें। एक ओर आन्दोलन के रूप-रेखा के लिए
संगठन और उसके अनुशासन हैं, जो सत्याग्रह के माध्यम से चेतना सृजन का कार्य है।
वहीं दूसरी तरफ़ रचनात्मक कार्यक्रम को भी उसके महत्व के साथ देखने की आवश्यकता है।
ये उनके अद्धभुत सामंजस्य हैं जो आधुनिक दौर में एक व्यवस्थित जीवनशैली का स्वरूप
तथा गतिशीलता के प्रमाण हैं। गांधी एक ऐसे महामानव हैं, जिन्होंने प्रयोगों के
माध्यम से ‘जीवन, समाज, धर्म तथा सत्ता’ को एक साथ जोड़ने का
काम किया। सभ्यताओं के अंतर्द्वंद्व से आगे बढ़कर प्रकृति प्रदत संस्कृति के
निर्माण के दिशा में इन्होंने सुनिश्चित योगदान दिया। साथ ही अहिंसा के दर्शन को
दुनिया के सामने लाने का काम किया।
गांधी
पश्चिम की सभ्यता से पुरब की सभ्यता को अधिक महत्व देते हैं। पश्चिम के और पुरव की
नगरीय सभ्यता के निर्माण से लेकर विस्तार तक में सभ्यताओं ने हिंसाओं का इतिहास ही
रचा है। यूँ कहें सभ्यताओं ने हिंसक समाज को रचा और गढ़ा है। इसलिए गांधी विकल्प
प्रस्तुत करते हुये स्थानीयता को प्राथमिकता देते हैं। उस स्थानीयता को संचालित
करने के लिए एक नैतिकवान मनुष्य का होना जरुरी है, इसके लिए गांधी आश्रम व्रत में
एकाद्श-व्रत का पालन कर स्वयं को सत्याग्रही के रूप में प्रस्तुत करते हैं। यानी
एकाद्शव्रत का पालन करके ही हम अपने अन्तःस्थल में मनुष्यता का निर्माण कर सकते
हैं, जो प्रकृति प्रदत होता है। प्रकृति से संस्कृति निर्माण की ओर बढ़ते हैं जो
अहिंसक होगा। जिसमें सत्य, अहिंसा, ब्रह्मचर्य, अस्वाद, अस्तेय, अपरिग्रह, अभय,
अस्पृश्यता निवारण, शारीरिक श्रम, सर्वधर्म-समभाव, स्वदेशी निहित है। इसे अपना कर
ही स्वराज्य से स्वराष्ट्र तथा अंतरराष्ट्रीयता का निर्माण किया जा सकता है।
अर्थात जहां सत्य है वहीं शुद्धता है, तभी उस सत्य से आनंद का अनुभव किया जा सकता
है। सत्य के साक्षात्कार का एक ही मार्ग, एक ही साधन अहिंसा है। इसके लिए
ब्रह्मचर्य यानी सभी इन्द्रियों पर संयम का होना जरुरी है। इन्द्रियों पर संयम के
लिए अस्वाद पर विजय प्राप्त करना होता है। अस्तेय के पालन से स्वाभिमान जागृत होता
है, जिससे सत्य, अहिंसा, ब्रह्मचर्य और अस्वाद पर हमारा नियंत्रण बना रहता है। तब
अपरिग्रह की भावना जन्म नहीं लेती है अर्थात यहाँ से न्याय का भाव पैदा होता है, जो
हमारे अंदर अभय जैसे साहस को पैदा करता है। फिर ये विश्वास सभी तरह के भेद-भाव से
पड़े हो कर चेतना निर्मित करता है। यहाँ से सेवा कर्तव्यरूप में सामने आता है जो
मनुष्य होने का गुण है। इसके उपरांत शारीरिक श्रम कर्तव्य पालन के लिए प्रेरित
करता है। यहीं से सामाजिकता का निर्माण होता है। यह सामाजिकता हमें सामाजिक लोकतंत्र की दिशा की ओर
अग्रसर कराती है। गांधी के शब्दों में इसे ही नागरिक तंत्र कह सकते हैं। इस नागरिक
तंत्र में काम का महत्व है न कि जाति आधारित काम का, इसलिए गांधी 1948 में जाति को जहर कहा। दुनियाभर के सभ्यताओं की
अपनी-अपनी सामाजिक मान्यताओं को लोकतंत्र या नागरिकतंत्र में समाहित करने हेतु
सर्वधर्म-समभाव की आवश्यकताओं का निहितार्थ दिखता है। गांधी बहुत ही सतर्कता से
धार्मिक आस्थाओं को ठेस पहुंचाये वगैर ही सर्वधर्म-समभाव के माध्यम से लोक आस्थाओं
को संगठित करने का काम करते हैं। सभी धर्मों के सनातनी मूल्य को सर्वधर्म प्रार्थना
सभा में शामिल करते हैं। जो अवधारणा मानव मूल्य को रेखांकित करता है, बाकी पर बहस
करना उचित नहीं समझते है। अर्थात गांधी सभी धर्मावलम्बियों को मानव मूल्यों से
जोड़ना चाहता है। वैसे इन सब अवधारणाओं की पुष्टि के लिए या संयोजन के लिए एक
पद्धति चाहिए। जो अर्थतंत्र से संभव है। यह वस्तु-विनिमय प्रणाली या मुद्रा-विनिमय
प्रणाली के माध्यम से संभव है। इसकी शुरुआत स्वयं से करनी होती है। इसलिए स्वदेशी
भावनाओं को स्थानीय भावनाओं में अपनाना तथा ग्रहण करना आवश्यक है। स्व का मूल्य
निर्धारण के उपरांत ही पर मूल्यों के निर्धारण को समझ सकते हैं। यहाँ एकाद्शव्रत
मन को संगठित करने का उपक्रम है तभी हम रचनात्मक कार्यक्रम का निर्धारण भी
सुव्यवस्थित और संतोषजनक समाधान की दिशा में तय कर पायेंगे।
प्रकृति
रूपी अहिंसा को जन-मानस तक पहुंचाने के लिए सत्याग्रह को जीवन प्रयोग में शामिल
करना आवश्यक है। सत्याग्रह यानी सत्य के लिये
आग्रह करना। अर्थात वह सत्य जो परिवर्तन के लिए अपना उपस्थिति करता है। गांधी जी
द्वारा उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम दशक में सत्याग्रह का प्रथम प्रयोग दक्षिण
अफ्रीका के प्रवासीय भारतीयों के अधिकारों की रक्षा के लिए कानून भंग कर किया गया
था। सत्याग्रह के इस प्रयोग के शुरु करने तक संसार ‘नि:शस्त्र प्रतिकार'
अथवा ‘निष्क्रिय प्रतिरोध’ (पैंसिव रेजिस्टेन्स) की युद्धनीति से ही वाकिफ था। जिसमें प्रतिपक्षी की
शक्ति हमसे अधिक होने पर सशस्त्र विरोध की जगह छल-कपट से उसे हानि पहुँचाना अथवा
उसके शत्रु से संधि करके उसे नीचा दिखाना आदि उचित समझा जाता था। सबल प्रतिपक्षी
से बचने के लिए ‘नि:शस्त्र प्रतिकार' की
युद्धनीति का अवलंबन भी लिया जाता था। लेकिन सत्याग्रह में ऐसा कुछ भी छल-कपट अथवा
सबल प्रतिपक्षी के समक्ष आत्मसमर्पण जैसी चीजें नहीं करनी होती हैं, बल्कि इसमें आमने-सामने वाद-प्रतिवाद होता है। व्यक्तिगत, सामाजिक,
राजनीतिक, शैक्षणिक एवं आर्थिक समझ के दुष्परिणाम की वजह से ही हिंसा अथवा युद्ध
जैसी स्थिति आती हैं, उस समझ को दुरुस्त व विकसित करने की प्रक्रिया ही सत्याग्रह
है। इसमें आत्मबल इतना प्रबल होता है कि इस मार्ग को अपनाने वाले कभी भी गलत
निर्णय नहीं निकाल सकते हैं। तथा साकारात्मक शांति बहाल करने में सहयोगी सिद्ध
होता है। इसका कारण है कि इसमें जो शक्ति का संचार होता है वह प्रकृति प्रदत होता
है। लेकिन सभ्यता आधारित कृत्रिम विकास की अवधारणा ने हमें टकराहट की संस्कृति दी
है, जिसके कारण साम्राज्यवाद जैसी अवधारणा दुनिया में जन्म ली है। जहाँ से युद्ध,
महायुद्ध में परिणत होता है। प्रथम विश्व युद्ध ने द्वितीय विश्वयुद्ध को जन्म
दिया। वहीं गांधी के अहिंसक समाज रचना का दर्शन दुनिया को तृतीय विश्वयुद्ध से
रोकता है और हमें स्थानीय नागरिक तंत्र की दिशा में बढ़ने का संकेत देता है। आज मनुष्य आधुनिकता और धार्मिकता के अंतर्द्वंद्व में फसा
हुआ है। वास्तविकता तो प्रकृति प्रदत शास्वत है, जिसको गांधी सत्य बताते हैं। और यह मनुष्य
के भीतर विद्धमान है। इसे समझना और दैनिक जीवन में प्रयुक्त करना ही सत्याग्रह है।
गांधी जी ने सत्याग्रह की संक्षिप्त व्याख्या इस प्रकार की थी-"यह ऐसा आंदोलन
है जो पूरी तरह सच्चाई पर कायम है और हिंसा के उपायों के एवज में चलाया जा रहा है।”अहिंसा सत्याग्रह दर्शन का सबसे महत्वपूर्ण तत्व है, क्योंकि सत्य तक पहुँचने और उन पर टिके रहने का एकमात्र उपाय अहिंसा ही
है। गांधी जी के ही शब्दों में "अहिंसा किसी को चोट न पहुँचाने की नाकारात्मक
(निगेटिव) वृत्तिमात्र नहीं है बल्कि वह सक्रिय प्रेम की विधायिका वृत्ति है। अर्थात साध्य की प्राप्ति के लिए साधन शुद्धता पर बल देते हैं।
आज दुनिया के विभिन्न क्षेत्रों में सत्याग्रह एवं अहिंसक प्रतिकार
के प्रयोग निरंतर चल रहे हैं। नेल्सन मंडेला, हेनरी डेविड थोरो, डॉ आंबेडकर, खान
अब्दुलगफ्फार खान, संत विनोबा, मार्टिन लूथर किंग, रिगोवर्ता मंचु, वी.पी.
कोइराला, मुबारक अवाद, इरोम शर्मिला, शिरीन इबादी, जय प्रकाश नारायण, मैरिड
कोरिगन, राम मनोहर लोहिया, पेट्रो केली, वाक्लेव हावेल, लेक वलेसा, मेधा पाटकर,
नारायण निधि, अन्ना हजारे, वेट्टी विलियम्स, आंग सान सू की, डेसमांड टूटू, सुलक
सीवरक्षा, देसाकू इकेदा, ए.टी.आर्यरत्ने एवं मलाला जैसे सत्याग्रही गांधी द्वारा
तैयार किये गए अहिंसा के मार्ग को अपना कर दुनिया में कई समस्या का समाधान ढूंढते
हैं और दुनिया को अहिंसा की ताकत से परिचित भी कराते हैं। गांधी दुनिया के पहले
ऐसे चिंतकों में हुये जिन्होंने चेतना निर्माण के साथ-साथ आगे के रचनात्मक
कार्यक्रमों को भी रेखांकित करते हैं। चेतना निर्माण के लिए सत्याग्रह और कर्तव्य
निर्वाहन के लिए रचनात्मक कार्यक्रम को अपनाते हैं। जिसमें कौमी एकता, अस्पृश्यता
निवारण, शराबबंदी, खादी, दुसरे ग्रामोद्योग, गांवों की सफाई, नयी या बुनियादी
तालीम, बड़ों की तालीम, स्त्रियाँ, आरोग्य के नियमों की शिक्षा, प्रांतीय भाषाएँ,
राष्ट्रभाषा, आर्थिक समानता, किसान, मजदुर, आदिवासी, कोढ़ी, विद्यार्थी के लिए
कर्तव्यों का निर्वाह करना और वर्तमान समय में रचनात्मक कार्यक्रम के नये
क्षेत्रों का चयन कर उसे हम अमल में ला सकते हैं। सत्याग्रह को उनके
सम्पूर्ण विचारों का बीज तत्व के रूप में देखा जा सकता है। जिसके माध्यम से अब-तक
के सभ्यताओं के विकास से पनपी हुई गड़बड़ीयों में सुधार लाकर वर्तमान को बेहतर बनाते
हुए भविष्य को अच्छा बनाए जाने के दिशा में सांस्कृतिक पूर्ण मूल्यांकन का पूर्वाभ्यास
की आवश्यकता है। अतः इसके लिए ‘सत्याग्रह’ से बेहतर कोई उपक्रम नहीं हो सकता है।
जिसमें रचनात्मक कार्यक्रम महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करता है। रचनात्मक
कार्यक्रम समाज परिवर्तन के लिए सामूहिक प्रयत्न और लोक शिक्षण का काम करता है।
लड़ाई अथवा हिंसा के द्वारा देश जीता जा सकता है, किन्तु उसे समृद्द तो रचनात्मक
कार्यक्रम के द्वारा ही किया जा सकता है। इस बात को समझाते हुए स्वयं गांधी
‘रचनात्मक कार्यक्रम : उसका रहस्य और स्थान’ नामक पुस्तक के माध्यम से पाठक, कार्यकर्ता, सेवक तथा सामान्य जन से कहते
हैं कि रचनात्मक कार्यक्रम ही पूर्ण स्वराज्य या मुकम्मल आजादी को हासिल करने का
सच्चा और अहिंसक रास्ता है। हिंसा में मनुष्य के पास करने के लिए सारी योग्यताएँ
हैं वह मानसिक स्तर पर, शारीरिक स्तर पर, भावनात्मक स्तर पर हिंसा को करता है।
लेकिन अहिंसा को अपनाने के लिए प्रकृति प्रदत शास्वत सत्य को समझने के बाद ही इसे
अपनाया जा सकता है। इसके लिए प्रकृति के प्रति समर्पण का भाव पैदा करना जरुरी है।
गांधी कहते हैं की प्रकृति के पास मनुष्य की आवश्यकता के लिए हर चीज उपलब्ध है,
लेकिन किसी एक मनुष्य की लोभ-लालच को पूरा करने में वह सक्षम नहीं है। इस भाव को
समझने के बाद ही हम व्यक्तिगत स्तर से राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में
अहिंसा को पहुंचा सकते हैं। जहां से
साकारात्मक शान्ति का जन्म संभव है। शान्ति में सिर्फ अहिंसा है, ऐसा नहीं है,
सभ्याताओं के बीच बढ़ते हुये हिंसाओं को नियंत्रण सत्याग्रह के माध्यम से संभव है।
आज दुनिया के पास परमाणु शक्ति है, सैन्य शक्ति है और तरह-तरह के वैज्ञानिक
क्षमताएँ भी हैं। इसके रहते जो शान्ति स्थापित है, वह नाकारात्मक शान्ति है। लेकिन
गांधी जिस साकारात्मक शान्ति की अवधारणा प्रस्तुत करते हैं, वह दबाव तथा भय मुक्त शान्ति है। इसमें सब का उदय,
सभी तरह का उदय, सभी के द्वारा उदय करने में सत्याग्रह अपनी भूमिका का निर्वाह
करता है। तभी सच्चे अर्थों में सर्वोदय लाया जा सकता है।
आश्रम
व्यवस्था एक खुली किताब है, यह ऐसे जीवनशैली को सिखाता है, जो प्रकृति प्रदत है। प्रकृति
कभी भी वायस्ट नहीं होता है। इसलिए हमें ये कहने में कोई गुरेज नहीं है कि ‘मानव निर्माण
प्रशिक्षण केंद’ रूपी आश्रम व्यवस्था को स्थानीयता के साथ जोड़कर जब-तक प्रकृति के
साथ सहजीवन स्थापित नहीं किया जायेगा तब-तक मानव सभ्यता को बचा पाना संभव ही नहीं
है, बल्कि असम्भव प्रतीत होता है। इसलिए ग्राम
स्वराज्य की आवश्यक है, जहाँ से पर्यावरण और प्राकृतिक संशाधनों की शुद्धता को बचाये
तथा बनाये रखा जा सकता है। और इसकी रक्षा भी स्थानीयता से ही संभव है, इसके लिए गांधी
जी के नयी तालीम शिक्षा नीति जो 3H फार्मूला पर आधारित है। जो हेंड,
हर्ट, हेड का एकीकरण का शिक्षानीति है। इसे प्रत्येक
10 किमी के अंतराल पर विकसित करना चाहिए। यही विकास के वर्तमान प्रतिमान पर
नियंत्रण लगा सकता है। ये विकास जो आसमान की विस्तार
की तरह फैल रही है, स्थानीय मूल्यों का प्रवाह किये वगैर ही फैलती जा रही है, ऐसे
में उसका प्रभाव आज पुराने मूल्यों से ज्यादा विभस्त रूप ले चुका है। जिसका असर स्त्री,
बच्चे और बूढ़े पर देखा जा सकता है। इस आधुनिक विकास ने हम युवा वर्ग को अपने
गिरफ्त में ले लिया है। इसलिए विकास की इस अवधारणा को बदलकर विकास का क्रम अंतिम
व्यक्ति से शुरू होके गुजरे, तभी पर्यावरणीय
संतुलन हो पायेगा। जो नयी तालीम के बुनियादी शिक्षा से ही संभव है। नयी तालीम अंतिम
व्यक्ति को सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था प्रदान कर मुक्कमल स्वराज्य लाने का तरिका है।
आधुनिक
सभ्यता ने जिस कदर शहरों और महानगरों को बढाया है तथा मनुष्य जिस कदर मशीनीकरण के
पीछे पागल होते जा रहा है। इनके दुष्प्रभाव देखने को मिल रहा है, शहर कचरों का ढेर
बनता जा रहा है और गाँव बेरोजगारी का स्थान लेते जा रहा है। परिणाम स्वरुप आये दिन
अम्लीय बर्षा का होना, सुनामी, साइकलोन, अजोन परत में छेद का होना एवं तरह-तरह के प्राकृतिक
आपदाओं का होना यह बतलाता है कि मानव सभ्यता खतरे के बिल्कुल करीब है, इसे बचाने
के लिए शहरी आकर्षण से बाहर निकल कर प्रकृति से प्रेम करें, तभी मनुष्य की ख़ुशी
बची रह सकती है। प्रकृति के वितरण के मूल स्वभाव को ट्रस्टीशिप में स्थापित कर
स्थानीय संसाधन के आधार पर खेती,पशुपालन तथा लधु एवं कुटीर उद्योग आधारित
सामाजिक संरचनाओं को स्थापित करने की दिशा में एक सामूहिक प्रयास की आवश्यकता है। तभी
नेचुरल जस्टिस, व्यक्तिगत जस्टिस्ट का स्वरूप ले सकता है। फिर सच्चे अर्थों में
सामाजिक न्याय हो पायेगा। इसके लिए वैचारिक स्तर पर मतभिन्नता को दूर करने की भी आवश्यकता
है। साथ ही गांधी जी के नैतिक मूल्यों को वर्तमान संदर्भों में नए तरीके से परिभाषित
करने की आवश्यकता भी है।
नीरज कुमार
पी. एच-डी. शोधार्थी
महात्मा गांधी
अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा
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