हाशिये पर पिछड़ो की राजनीति और भारतीय लोकतंत्र
-नीरजकुमार
पिछड़ा कौन है? कौन है जो इसके लोकतांत्रिक अधिकारों पर कब्ज़ा जमाये हुये है। फ़्रांस की राज्यक्रांति ने जब पहली बार दुनिया के सामने यह विचार दिया की एक आम नागरिक भी सत्ता को संभाल सकते हैं तो दुनिया के सामने इस नई दृष्टि का संचार हुआ। इसके लिए किसी रानी का बेटा होना जरुरी नहीं था , तभी से धर्म की भूमिका समाप्त हो गयी, क्योंकि राजा तो धर्म की उत्पत्ति का कारक रहा है. जो धर्म की रक्षा करेगा इस अवधारणा पर उसका शासन टिका हुआ था। लेकिन लोकतंत्र की अवधारणा में राजा जन भावनाओं की रक्षा करने के लिए है। क्योंकि इसकी बुनियाद समता,स्वतंत्रता और बंधुत्व पर टिकी है। धर्म ने जन को दो भागों में विभक्त कर रखा था। धर्म रक्षक जो हर कीमत पर धार्मिक आडम्बर और पाप-पूण्य के आधार पर पवित्र व अपवित्र समाज को स्थापित करना चाहता था जो आगे चलकर समाज को दो भागों में विभक्त किया जो तथाकथित पवित्र समाज गैर पिछड़ा कहलाया तो शोषित-वंचित समाज अपवित्र कहलाया जिसे पिछड़ा वर्ग कहा गया । इसी आधार पर तैयार किये गये भारत के संविधान में यह साफ़-साफ़ परिभाषित किया गया है की गैर पिछड़ा के अलावे जो भी है वो सभी के सभी पिछड़ा वर्ग में आता है, जिसकी पहचान कुछ इस प्रकार वर्णित है। ओबीसी,एसटी.एससी.ये सभी के सभी वर्ग बी.सी. में आते है। इसमें धर्म और धर्मांतरण एक खेल है। बाबा साहब भीम राव आंबेडकर द्वारा धम्म दीक्षा लेने के उपरान्त कुछ ही दिनों में उसकी परिनिर्वाण हो गया. बहुत बड़ा शोषित तबका धर्मान्तरित हुए लेकिन इसके बाद पिछड़े, दलित, आदिवासी समुदाय को मार्गदर्शित करने का कार्य किसी ने भी नहीं किया. इस तरह से ओबीसी, एससी. एसटी. वर्ग ही सामुदायिक हित की बातें गौण सी रह गई. बैकवर्ड क्लास के हित के लिए डॉ. आंबेडकर के बाद और कोई बड़ा नेता या सामाजिक चिन्तक नहीं दिखता है जो कि इस वर्ग के लिए बड़ा कार्य किया हो जिससे इस समुदाय का उत्थान हों सकें. शायद आज के भारत का तस्वीर कुछ और ही होती अगर इस वर्ग के हित के लिए अम्बेडकर, पेरियार के बाद बड़े चिन्तक या समाजिक प्रणेता कार्य करते। हुआ यूँ की भारत में पिछड़ा के नाम पर संवैधानिक अधिकार पाते देख गैर पिछड़ा समुदाय के लोगों ने षड्यंत्र रचा और मुस्लिम लीग के माध्यम से टू नेशन की थ्योरी सामने लाने की कोशिश की। और हिन्दू के नाम से ब्राह्मण भारत पर राज करने तथा मुस्लिम के नाम पर मुस्लिम पाकिस्तान बना कर राज करने का फैसला ले लिए और इस तरह ये लोग अपने मकसद में कामयाव भी रहे। जब पाकिस्तान और बंग्लादेश के पिछड़े समुदाय के लोग वहाँ से भारत नहीं आये और उन्हें हिन्दू मान कर भारत-पाकिस्तान के ब्राह्मणों ने बहुसंख्यक-अल्पसंख्यक की राजनीति को कायम रखा। इसमें हिन्दू पिछड़ा और मुस्लिम पिछड़ा आपस में भीड़ते रहे, जो अब खुलकर सामने आने लगा है। पाकिस्तान और बंग्लादेश के पिछड़े समुदाय पर साम्प्रदायिकता के नाम पर अल्पसंख्यक बहुसंख्यक की राजनीति के तहत कत्ले आम शुरू रहा। जब बचे हुये सभी पिछड़े समुदाय के लोग पाकिस्तान और बंग्लादेश में इस्लाम कुबूल कर लिया है तो आज इन दोनों देशों में असली मुसलमान और नकली मुसलमान का सर्वे हो रहा है ताकि एक प्रतिशत ब्राह्मण मुस्लिम सत्ता और बड़े पदों पर आसीन रहें... बांकी पिछड़े मुसलमान को सत्ता और बड़े नौकरियों से वंचित रखा जा सके, ये बात शायत उन मुस्लिमों को अभी समझ में नहीं आ रही जो भारत और पाकिस्तान आजादी के पूर्व ही इस्लाम कबूल कर चुके थे। इसे विस्तार से समझने के लिए आजादी के वक्त बिहार से शुरू हुये पासमांदा मुसलमान की पूरी लड़ाई के इतिहास को देख कर समझा ही जा सकता है।
पसमांदा की लड़ाई को देख उस समय के ब्राह्मण हिन्दू और ब्राह्मण मुस्लिम ने यह समझ लिया की अगर ये शक्तियां पिछड़े के नाम से एक हो गयी तो संयुक्त भारत का प्रथम प्रधानमंत्री कोई पिछड़ा होगा और मंत्रिमंडल sc, st से भर जायेगा। ये धर्मनिरपेक्षता सिर्फ धोखा है और कुछ भी नहीं... आगे धर्मनिरपेक्षता और साम्प्रदायिकता के नाम से भारतीय राजनीति शुरू हुई। कभी साम्प्रदायिकता तो कभी धर्मनिरपेक्षता यानि सेकुलर राजनीति के बीच सामाजिक न्याय की राजनीति अपना दम तोड़ता रही है। परन्तु इन दोनों राजनीति के बीच अपनी सफलता फिलहाल तलाश भी रही है, इस बीच सामाजिक न्याय पर आधारित एवं समाजवादी विचारधारा पर आधारित पार्टियां बहुजन यानि पिछड़ों को संगठित करने के साथ अपनी राजनीति शुरू की । ये विचारधारा धीरे-धीरे भारत में बाबा साहब भीम राव आंबेडकर, डॉ राममनोहर लोहिया, कांशीराम, कर्पूरी ठाकुर आदि के जरिये मजबूत भी हुई लेकिन इसकी जड़े हिलाने के लिए हिंदुत्ववाद की राजनीति शुरू हुई और 1992 में अयोध्या में बाबरी मस्जिद के ढाँचे को गिराया गया। जब कर्पूरी ठाकुर स्वतंत्र भारत में बिहार विधानसभा में आरक्षण बिल लाये तो हिंदूवादी संगठन ने कहा कि ये आरक्षण हिन्दू एकता-अखंडता को खंडित करने के लिए लाया गया है। बिल आते ही पुरे बिहार में अफरा-तफरी मच गया और दीवाल पर भद्दे-भद्दे नारे लिखे गये, ये आरक्षण कहाँ से आई... कर्पूरी की माई वियाई! कर्पूरी कर पूरा नहीं पकड स्तुरा! यानि तुम सत्ता में भी हो तो बात गैर पिछड़ा का ही चलेगा, तुम्हारी सामाजिक हैशियत हमारे बराबर का नहीं हो सकते है... चूँकि तुम अपवित्र हो। ठीक एक साल बाद हिन्दू एकता के नाम पर आरक्षण को रोकने के लिए 1989 में भागलपुर दंगा होता है। ये भारत का पहला दंगा होता है जो बहुत ही लम्बे समय तक चलता है। छह माह तक चलने वाली ये सांप्रदायिक हिंसा की खासियत ये थी की पहली बार सांप्रदायिक हिंसा शहर से गाँव तक पहुंचा जिसके चलते गाँव-के-गाँव पलायन के शिकार हुये। फिर बिहार के पिछड़ों ने कांग्रेस की जड़ें को उखाड़ फेका, और लालू प्रसाद यादव सामाजिक न्याय नायक बने... आज भी सामाजिक न्याय का केंद्र कमोंवेस बिहार ही है। इस मुद्दे पर लालू जी के व्यक्तिगत राजनीति कमिया रहने के वाबजूद भी तटस्थ दिख रही हैं. लेकिन ये राजनीति अपने स्वभाव को प्राप्त कर पायेगी या नहीं यह विचारणीय है। वर्तमान में शरद यादव साझी संस्कृति और साझा विरासत के जरिये सामाजिक न्याय को आधार देने का प्रयास कर रहे हैं। लेकिन आये दिन इस साझी विरासत को चुनौती देने के लिए लव जिहाद, खान-पान और पहनावे पर सांप्रदायिक शक्तियाँ एक ओर लगातार हमला बोल रही है तो दूसरी तरफ पूंजीवाद बाजार के माध्यम से और निजीकरण के माध्यम से हमें हमारे हक़ से वंचित करने का षडयंत्र कर रही है. ये मंदिर के नाम पर राजनीत करने वाले अपनी पविता को सावित्र करने के लिए शोषित-वंचित वर्ग को हाशिये पर बनाये रखना चाहती है।
इन लोगों दलित, पिछड़े और आदिवासी को संगठित करने में कोई कसर नहीं छोड़ा परन्तु धार्मिक चादर ओढ़े होने के कारण यहाँ भी दलित-पिछड़ो की राजनीति हाशिये पर पड़ा रह गयी। कोई हिन्दू तो कोई बौद्ध होने के कारण भारतीय जनमानस में पिछड़ा वर्ग अपनी पहचान नहीं बना पाया।
पूर्ण लोकतंत्र के भय से भयभीत ये षड्यंत्रकारी लोग 1894 में जब अंग्रेज ने भूमि रखरखा बिल लाया तभी इन लोगों ने बहुत ही चालाकी के साथ खतियान में जाति के साथ-साथ धर्म को अंकित किया। फिर इस चालाकी को शादी, जन्म- मृत्यु के कागजों में धर्म को जोड़ता गया। आप खतियान में और शादी से संबंधित कोई भी कागजों में धर्म का जिक्र इस प्रकार पायेंगे। ये खतयानी जमीन श्री मोहन दास का है जिसकी जाति चमार है ये हिन्दू है। वैसे ही जब आप शादी का सर्टिफिके बनवायेंगे तो उसमें भी कुछ इस तरह का जिक्र मिलेगा कि यह अमुक शादीयां हिन्दू अथवा मुस्लिम या सिख व ईसाई रीति रिवाज से तय हुई है। यह नहीं की प्रेम-मोहब्बत या लोकतांत्रिक मूल्यों के आधार पर अमुक शादियाँ हुई है। कुल मिलाकर जमीन, पति-पत्नी का संबंध किसी न किसी धर्म का है। जबकि जमीन व्यक्ति या लोकतंत्र के पहचान से न होकर धर्म का हुआ वही पत्नी किसी धर्म के रीति रिवाज से बंधी हुई है। तो क्या राजनीति साम्प्रदायिकता और धर्मनिर्पेक्षयता के आधार पर तय नहीं होगी। इस तरह पिछड़े वर्ग की राजनीति हाशिये पर आना लाजमी है। अब जन्म व मृत्यु प्रमाण-पत्र भी किसी धर्म के पहचान से बनाया जा रहा है। फिर पिछड़े वर्ग में आने वाले एसटी.एससी. ओबीसी.की राजनीति पहचान कैसे संभव है।
इस पहचान को बनाये रखने के लिए भाजपा और कॉंग्रेस दोनों बराबर का षड्यंत्रकारी है। नौकरी अथवा शैक्षणिक संस्थानों में भी भरे जाने वाले आवेदन में धर्म का कॉलम बना दिया गया है। ताकि पिछड़ा वर्ग हिन्दू-मुस्लिम, सिख-ईसाई आपस में है भाई-भाई , अथवा अल्पसंख्यक-बहुसंख्यक के झगड़े में फंसा रहे और साम्प्रदायिकता और धर्मनिरपेक्षता की राजनीति बराबर बना रहे। ये पूरा खेल लोकतंत्र में धर्म सत्ता को अपरोक्ष रूप से बनाये रखना एक बड़ा साजिश ही है। सामाजिक न्याय की लड़ाई सिर्फ भाषणों का विषय बन कर रह गई है। अगर साम्प्रदायिक और धर्मनिरपेक्षता की राजनीति से उबरना है तो धर्म के स्थान पर हिन्दू-मुस्लिम, सिख-ईसाई के खेल से बाहर आकर अब सभी पिछड़े वर्ग के लोगों को अपनी पिछड़ा पहचान को लोकतान्त्रिक आधार देना होगा और धर्म के स्थान पर मूलनिवासी या पिछड़ा वर्ग अंकित करना होगा । ऐसा करने से हम कमजोर नहीं बल्कि पहले से ज्यादा ताकतवर होंगे। अंतरराष्ट्रीय समुदाय हमारे लोकतान्त्रिक निर्णय के साथ होगा।
आज अगर हम आरक्षण के नाम पर ठगे जा रहे हैं तो सिर्फ व सिर्फ धर्म की पहचान की वजह से |अब हमें आवश्यकता है की हम गैर पिछड़े समुदाय से अपने को अलग कर अपना पिछड़ा वर्ग का पहचान कायम करें। तभी सामाजिक स्तर पर गैर-बराबरी मिट पायेगी।
दक्षिण में प्रेसीडेंसी क्षेत्रों और रियासतों के एक बड़े क्षेत्र में पिछड़े वर्गों (बी.सी.) के लिए आजादी से बहुत पहले ही आरक्षण की शुरुआत हुई थी। महाराष्ट्र के कोल्हापुर में महाराजा छत्रपति साहू जी महाराज ने 1902 में पिछड़े वर्गों की गरीबी तथा सामाजिक हैशियत को ऊपर उठाने के लिए नौकरियों में तथा दलित वर्गों के कल्याण के लिए आरक्षण उपलब्ध कराने वाले पहले सरकारी आदेश रहा है। शुक्र मानिये अंग्रेजों का जिन्होंने हमें लिखित आजादी दी ब्रिटिश पार्लियामेंट के तहत , वरना ये लोग अब तक में हमें अछूतों और शूद्रों की भांति जीवन गुजरने पर विबस कर दिया होता। रेत्तमलई, श्रीनिवास, पेरियार, आयोथीदास पंडितर, ज्योतिराव फुले, छत्रपति साहू जी महाराज, बाबा साहब आंबेडकर आदि ने आजादी के पहले इस मुहीम को चलाये तो वही 1979 में सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े की स्थिति का मूल्यांकन करने के लिए मंडल आयोग को स्थापित कर पिछड़े वर्ग के रूप में सभी धर्मों के चादर पोस पिछड़े वर्ग के रूप में 1,257 समुदायों का वर्गीकरण किया गया। बी पी मंडल आधुनिक दौर के आरक्षण के पुरोधा हुए फिर भी दुःखद ये रहा कि पिछड़े वर्ग के कई वर्ग समुदाय अपने को गैर पिछड़ा मानने में गर्व महसूस करता रहा है। लेकिन सामाजिक एवं राजनीति हैशियत नहीं हाशिल हो पाया तो अब वो भी आंदोलन कर ओबीसी का दर्जा प्राप्त करने में लगे है। ये ठीक है कि इनकी नींद देर से खुली है पर दुरुस्त खुली है स्वागत है सभी बी सी का पर धर्म से बाहर आकर अपनी पहचान बनाये और सामाजिक आधार पर आरक्षण को और भी मजबूती दें, इसके लिए अब आधे-अधूरे आरक्षण से काम नहीं चलने वाला है 100 प्रतिशत हमें हमारा अधिकार मिले इसकी लड़ाई लड़ी जाये। हम गैर पिछड़ों को भी 100 प्रतिशत आरक्षण में शामिल करेंगे। अब तक वो आरक्षण के दायिरे बाहर रह कर 500% अपने लिए जगह सुरक्षित कर रखा है। जिसे घटाकर 100 प्रतिशत पर लाना होगा। प्राइवेट सेक्टर को या तो खत्म करना होगा अथवा वहां भी हमें पूरा-पूरा हक़ अधिकार चाहिए।
-लेखक स्वतंत्र चिंतक है.वर्तमान में
वर्धा स्थित महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय के गांधी एवं शांति अध्ययन विभाग में शोधरत है.
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