रविवार, 26 मार्च 2017

मिट्टी और श्रम का संदेश

शिल्पकार
नीरज कुमार
शोध-छात्र, विकास एवं शांति अध्ययन केंद्र
म. गां. अं. हिं वि., वर्धा, महाराष्ट्र
मोबाइल- 8969456030

हम शिल्पकार, विषम परिस्थितियों को जीना जानते है.
मिट्टी और श्रम के संयोग से शिल्प को गढ़ना जानते है.
हर शिल्प, हुनर बनकर जीवन-शैली को रचता है.
 फिर पढ़ते हैं हम जीवन की हर वो किताब को...
और यात्रा करते हैं नित्य नयी हुनर की तलाश में,
जिसमें छुपी होती है हुनर की कोई-न-कोई कहानी,
उसमें सुनते है हम हुनर में जीवन की छुपी ध्वनियों को,
फिर जीते हैं शिल्प के विभिन्न आयामों को और स्वाभिमान को,
और करते हैं उस हुनर की तारीफ़ और खुश होते हैं अपने निश्चय से...
अहंकार न आ पाए इसलिए सीखे हुये हुनर को,
एक-दूसरे तक पहुंचाते है, समाज कार्य के रूप में...
शिल्प की रचनात्मकता बनी रहे, इसलिए करते हैं नित्य नया प्रयोग...
बनते नहीं गुलाम हम अपनी आदतों के,
रोज एक कदम बढ़ते हैं समय की गति से,
चूँकि मिट्टी और श्रम काश्तकारिता की पहचान है.
और काश्तकारिता गतिविधियों का,
लेकिन बदले स्वरूप में गतिविधियाँ मिट्टी और मशीन से हो रही हैं
इसलिए आदर्श मानक की तलाश में बदलते रहते हैं
अपना दैनिक नियम और व्यहार को,
रोज बात करते हैं एक अजनबी और अनजान से
ताकि अपना सके अलग-अलग हुनर रूपी रंग इस संसार के,
तभी तो महसूस करते हैं, हुनर के उस मर्म को, उस आवेगों को,
और उससे जुड़ी अशांत भावनाओं को,
वे जिसके ऊपर होता रोज षड्यंत्र कार्पोरेटों का,
सत्ता का, मठों का और हिंसक संगठनों का.
आखिर क्यों न हो आँखे नम और धड़कने तेज,
अफवाहों और षड्यंत्रों के शिकार जो होते हैं हम...
फिर धड़कनों को शांत कर आंसुओं को सूख जाने तक इंतजार नहीं करते हैं.
बल्कि नए सिरे से तैयार करते हैं अपने वज़ूदों को,
जो बना है मिट्टी से, जिसमें पञ्च तत्व की असीम ऊर्जा है श्रम के लिए,
बदलने उठते है अपनी जिन्दगी को और नए सिरे से गढ़ने इस संसार को...
चूँकि हम शिल्पी और काश्तकार विषम परिस्थिति को जीना जानते हैं.
अनिश्चितता से लड़ते हैं केवल इसलिए की निश्चितता का स्वप्न दे सकें,
ताकि मिट्टी और श्रम का संदेश सदा काम आता रहे इस ससार में ....


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